और उसी शाम बॉबी शहर चली आई। अगले ही दिन जाकर उसने कॉलेज की औपचारिकताएं पूरी की और उसका दाखिला हो गया। हालांकि वह शहर के जाने-माने उद्योगपति की पुत्री थी, इसलिए ज्यादा दिक्कत तो नहीं आई, मगर कॉलेज में जाते ही उसका सामना वहां के मनचले लड़कों से हो गया। रंजीत और विनोद। दोनों कॉलेज के गुंडे थे और पिछले चार साल से एक ही क्लास में फेल हो रहे थे। अब वे बॉबी की क्लास में थे। बॉबी वहां अपनी मां शारदा देवी के साथ कार से पहुंची थी, मगर उसका पहनावा उसकी जवानी की नुमाईश कर रहा था। उसने घुटनों तक की स्कर्ट और टॉप पहन रखा था, जिसमें पीछे केवल एक गांठ बंधी थी। टॉप में सामने से उसकी चूंचियां का ऊपरी हिस्सा नजर आ रहा था और स्कर्ट छोटी होने के कारण उसकी गोरी चिकनी पिंडलियां, उसका यह पहनावा किसी को भी उत्तेजित करने के लिए काफी था। बॉबी की कार जैसे ही कॉलेज में आकर रुकी, वैसे ही कई लड़कों का ध्यान उस तरफ गया। एक तरफ दीवार पर रंजीत और विनोद बैठे थे, जैसे ही बॉबी कार से उतरी उसकी छोटी स्कर्ट थोड़ा सा ऊपर हुई और उसका लाल जांघिया नजर आ गया। बस दोनों मनचलों के लिए इतनी झलक ही दिलों और लौड़ों में आग लगाने के लिए काफी थी। दोनों की सीटियां एक साथ बजी और जैसे ही बॉबी ने उनकी तरफ देखा, रंजीत ने उंगली और अंगूठे से गंदा सा इशारा किया। बॉबी ने घृणा से मुंह घुमा लिया। तब तक उसकी मां भी दूसरी तरफ से उतरी, उसने बॉबी के चेहरे पर असामान्य भाव देखे और पीछे गंदा इशारा कर रहे रंजीत पर भी उसकी नजर पड़ गई। शारदा देवी 40-45 की उम्र में पहुंच चुकी अधेड़ महिला थीं, इसके बाद भी उनका शरीर गठा हुआ था। पति की मौत के बाद सफेद साड़ी ही उनका पहनावा था। चेहरे पर रईसी का रुआब और जबड़े एकदम भिंचे। शारदा देवी को देखकर रंजीत और विनोद दोनों सकपका गए। जब तक वे कुछ कहतीं दोनों वहां से रफूचक्कर हो गए। शारदा देवी का चेहरा गुस्से से लाल हो चुका था। वे बॉबी से बोली,
इसी कॉलेज में दाखिला लेने के लिए तुम इतना उतावली हो रही हो। देख रही हो यहां के लड़कों की हरकतें। इसीलिए मैं कह रही हूं कि लड़कियों के कॉलेज में दाखिला लो।
दोनों की हरकतें बॉबी के लिए भी असहनीय थीं और वह भी इस कॉलेज में अब ठहरना तक नहीं चाहती थी, मगर तभी उसे कमल का ख्याल आ गया और वो बोली,
नहीं मां इस तरह के शोहदें तो हर तरफ होते हैं। लड़़कियों के कॉलेज के सामने भी बैठे ही रहते हैं। क्या ग्यारंटी की वहां इस तरह के वाकये से दो-चार नहीं होना पड़ेगा। और यह शहर का सबसे अच्छा कॉलेज है। कुछ मनचले हैं तो क्या, मुझे अपना भविष्य देखना है।
बेटी की जिद के आगे शारदा देवी की नहीं चल पाती थी। उन्होंने उसे बड़े लाड़ से पाला था। वे ठंडी सांस लेते हुए बोली,
ठीक है, जैसा तुम चाहो। इतना कहकर वे बॉबी को लेकर प्रिंसिपल के कमरे की तरफ बढ़ गईं। उनकी बात पहले से ही हो चुकी थी, इसलिए बॉबी के केवल आवेदन पत्र पर साइन करना पड़ा। प्रिसिपल ने उसका दाखिला पत्र हाथों-हाथ उसके हाथ में थमा दिया और कहा,
एक पखवाड़े में कॉलेज शुरू हो जाएंगे। तब तक छुट्टी मनाओ।
तभी शारदा देवी बोल पड़ी, सर आपके यहां कुछ लड़कों का व्यवहार मुझे पसंद नहीं आया। वे बदतमीजी कर रहे थे।
प्रिंसिपल ने कहा, आप चिंता न करें मैडम, मैं उनका इलाज कर दूंगा। आगे से वे ऐसी कोई भी हरकत नहीं करेंगे। आप निश्चिंत होकर इसे कॉलेज भेजिए।
तभी बॉबी बोल पड़ी, सर आपके यहां छात्रवृत्ति का क्या नियम है।
क्यों तुम्हें छात्रवृत्ति की क्या जरूरत पड़ गई।
मुझे नहीं, मौसी के गांव का एक गरीब लड़का है, उसने आपके यहां आवेदन दिया है।
क्या नाम है उसका है, प्रिंसिपल ने पूछा।
जी कमल, बॉबी ने जवाब दिया। क्या उसकी छात्रवृत्ति मंजूर हो गई?
तभी शारदा देवी बोल पड़ीं, तुम्हें इससे क्या मतलब बॉबी। तुम्हारा दाखिला हो गया न।
नहीं मां वह मौसी के घर के काम करता था। बेचारा गरीब है। पिता पढ़ा नहीं सकते, मगर वह पढऩा चाहता है। अगर आप थोड़ी सिफारिश कर दें तो पढ़ लेगा।
बॉबी तुम इस तरह के लड़कों को नहीं जानती, इसलिए उससे ज्यादा सहानुभूति दिखाने की जरूरत नहीं।
मुझे कोई सहानुभूति नहीं है, मगर मौसी ने कहा था कि मैं उसके लिए आपसे बात करूं।
छोटी ने कहा था, फिर देखना पड़ेगा। शारदा देवी यह कहकर प्रिंसिपल की तरफ घूमी और पूछा, उसके आवेदन पर कुछ हुआ सर।
मैडम आवेदन तो आया है और उसका पिछला रिकॉर्ड भी काफी बेहतर है। हमे ऐसे विद्यार्थियों को अपने कॉलेज में दाखिला देकर खुशी ही होती है, मगर ट्रस्टियों से पूछना पड़ेगा।
आप दाखिला दे दीजिए, मैं ट्रस्टियों से बात कर लूंगी। आखिर मैं भी तो एक सदस्य हूं न। शारदा देवी ने कहा।
जी मैडम आप कहती हैं तो मैं अभी फायनल किए देता हूं। यह कहकर प्रिंसिपल ने कमल की फाइल मंगवाई और उस पर साइन कर दिए।
यह देखकर बॉबी का दिल बल्लियों उछलने लगा और वह कल्पना लोक में तैरने लगी कि 15 दिन बाद वह फिर से कमल की बांहों में होगी। उससे अपनी खुशी संभाली नहीं जा रही थी, मन ही मन वह झूम रही थी, बाहर से खामोश बैठी रही।
जब वे बाहर निकलीं तो रंजीत और विनोद को गेट के सामने मंडराते देखा। बॉबी की नजर उन पर पड़ चुकी थी और उन दोनों ने नजरें मिलते ही बॉबी को फिर से गंदा इशारा किया। शारदा देवी ने यह नहीं देखा था। बॉबी ने मन ही मन चैन की सांस ली, उसने सोचा यदि मां फिर से इनकी हरकतें देख लेती तो उसका कॉलेज आना मुश्किल में पड़ जाता। प्रिंसिपल साहब शारदा देवी को छोडऩे बाहर तक आए थे। उन पर नजर पड़ते ही दोनों लड़के वहां से खिसक लिए। बॉबी ने मन ही मन ठान लिया कि कॉलेज आने के बाद दोनों को सबक जरूर सिखाएगी और इस काम में कमल और अपनी सहेलियों की भी मदद लेगी।
इसी कॉलेज में दाखिला लेने के लिए तुम इतना उतावली हो रही हो। देख रही हो यहां के लड़कों की हरकतें। इसीलिए मैं कह रही हूं कि लड़कियों के कॉलेज में दाखिला लो।
दोनों की हरकतें बॉबी के लिए भी असहनीय थीं और वह भी इस कॉलेज में अब ठहरना तक नहीं चाहती थी, मगर तभी उसे कमल का ख्याल आ गया और वो बोली,
नहीं मां इस तरह के शोहदें तो हर तरफ होते हैं। लड़़कियों के कॉलेज के सामने भी बैठे ही रहते हैं। क्या ग्यारंटी की वहां इस तरह के वाकये से दो-चार नहीं होना पड़ेगा। और यह शहर का सबसे अच्छा कॉलेज है। कुछ मनचले हैं तो क्या, मुझे अपना भविष्य देखना है।
बेटी की जिद के आगे शारदा देवी की नहीं चल पाती थी। उन्होंने उसे बड़े लाड़ से पाला था। वे ठंडी सांस लेते हुए बोली,
ठीक है, जैसा तुम चाहो। इतना कहकर वे बॉबी को लेकर प्रिंसिपल के कमरे की तरफ बढ़ गईं। उनकी बात पहले से ही हो चुकी थी, इसलिए बॉबी के केवल आवेदन पत्र पर साइन करना पड़ा। प्रिसिपल ने उसका दाखिला पत्र हाथों-हाथ उसके हाथ में थमा दिया और कहा,
एक पखवाड़े में कॉलेज शुरू हो जाएंगे। तब तक छुट्टी मनाओ।
तभी शारदा देवी बोल पड़ी, सर आपके यहां कुछ लड़कों का व्यवहार मुझे पसंद नहीं आया। वे बदतमीजी कर रहे थे।
प्रिंसिपल ने कहा, आप चिंता न करें मैडम, मैं उनका इलाज कर दूंगा। आगे से वे ऐसी कोई भी हरकत नहीं करेंगे। आप निश्चिंत होकर इसे कॉलेज भेजिए।
तभी बॉबी बोल पड़ी, सर आपके यहां छात्रवृत्ति का क्या नियम है।
क्यों तुम्हें छात्रवृत्ति की क्या जरूरत पड़ गई।
मुझे नहीं, मौसी के गांव का एक गरीब लड़का है, उसने आपके यहां आवेदन दिया है।
क्या नाम है उसका है, प्रिंसिपल ने पूछा।
जी कमल, बॉबी ने जवाब दिया। क्या उसकी छात्रवृत्ति मंजूर हो गई?
तभी शारदा देवी बोल पड़ीं, तुम्हें इससे क्या मतलब बॉबी। तुम्हारा दाखिला हो गया न।
नहीं मां वह मौसी के घर के काम करता था। बेचारा गरीब है। पिता पढ़ा नहीं सकते, मगर वह पढऩा चाहता है। अगर आप थोड़ी सिफारिश कर दें तो पढ़ लेगा।
बॉबी तुम इस तरह के लड़कों को नहीं जानती, इसलिए उससे ज्यादा सहानुभूति दिखाने की जरूरत नहीं।
मुझे कोई सहानुभूति नहीं है, मगर मौसी ने कहा था कि मैं उसके लिए आपसे बात करूं।
छोटी ने कहा था, फिर देखना पड़ेगा। शारदा देवी यह कहकर प्रिंसिपल की तरफ घूमी और पूछा, उसके आवेदन पर कुछ हुआ सर।
मैडम आवेदन तो आया है और उसका पिछला रिकॉर्ड भी काफी बेहतर है। हमे ऐसे विद्यार्थियों को अपने कॉलेज में दाखिला देकर खुशी ही होती है, मगर ट्रस्टियों से पूछना पड़ेगा।
आप दाखिला दे दीजिए, मैं ट्रस्टियों से बात कर लूंगी। आखिर मैं भी तो एक सदस्य हूं न। शारदा देवी ने कहा।
जी मैडम आप कहती हैं तो मैं अभी फायनल किए देता हूं। यह कहकर प्रिंसिपल ने कमल की फाइल मंगवाई और उस पर साइन कर दिए।
यह देखकर बॉबी का दिल बल्लियों उछलने लगा और वह कल्पना लोक में तैरने लगी कि 15 दिन बाद वह फिर से कमल की बांहों में होगी। उससे अपनी खुशी संभाली नहीं जा रही थी, मन ही मन वह झूम रही थी, बाहर से खामोश बैठी रही।
जब वे बाहर निकलीं तो रंजीत और विनोद को गेट के सामने मंडराते देखा। बॉबी की नजर उन पर पड़ चुकी थी और उन दोनों ने नजरें मिलते ही बॉबी को फिर से गंदा इशारा किया। शारदा देवी ने यह नहीं देखा था। बॉबी ने मन ही मन चैन की सांस ली, उसने सोचा यदि मां फिर से इनकी हरकतें देख लेती तो उसका कॉलेज आना मुश्किल में पड़ जाता। प्रिंसिपल साहब शारदा देवी को छोडऩे बाहर तक आए थे। उन पर नजर पड़ते ही दोनों लड़के वहां से खिसक लिए। बॉबी ने मन ही मन ठान लिया कि कॉलेज आने के बाद दोनों को सबक जरूर सिखाएगी और इस काम में कमल और अपनी सहेलियों की भी मदद लेगी।